कविता: रात की तन्हाइयों मे ढूंढती एक शोर हूँ

रात की तन्हाइयों मे
_x000D_ ढूंढती एक शोर हूँ
_x000D_ कभी लगता कहीं मैं हूँ नहीं
_x000D_ कभी मैं ही सब ओर हूँ
_x000D_ मैं हु साहिल
_x000D_ मैं हूं मंजिल
_x000D_ मैं हु मेरा रास्ता
_x000D_ जो खो जाए खुद में
_x000D_ मैं वो पागल हूँ
_x000D_ हाँ मैं वो पागल हूँ

_x000D_ _x000D_

सबसे सयानी
_x000D_ हूँ एक कहानी
_x000D_ मीरा थी जैसी
_x000D_ वैसी हु दीवानी
_x000D_ मैं हूँ अकेली
_x000D_ खुद की सहेली
_x000D_ मैं हु पहेली
_x000D_ जो हैं कलंक खुद में
_x000D_ मैं वो काजल हूँ
_x000D_ हां मैं पागल हूँ

_x000D_ _x000D_

मन मे गरजती
_x000D_ अँखियों से बरसती
_x000D_ खुद को तरसती
_x000D_ कैसी हूँ मैं हस्ती
_x000D_ उदासी हैं मस्ती
_x000D_ खुद की हूँ कायल
_x000D_ बिन बजती पायल
_x000D_ कितनी मैं घायल
_x000D_ मैं बिन बरसा बादल हूँ
_x000D_ हां मैं पागल हूँ
_x000D_ कितनी पागल हूँ।

_x000D_ _x000D_

- हर्षिता माथुर "आद्या"


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