कविता: मां तेरे लिए क्या लिखूं , जब तू खुद ही मुझे लिख चुकी है

मां तेरे लिए क्या लिखूं ,

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जब तू खुद ही मुझे लिख चुकी है।

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मां तेरे लिए क्या कहूं,

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 मेरी वाणी भी तू और मेरे लफ्ज़ भी तू है।

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सबका कहना है खुदा पे यकीन रखो , 

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मेरा तो खुदा भी तू और यकीन भी तू है।

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सच है उस पत्थर की मूरत से झुककर कभी कुछ मांगा नहीं,

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 मेरा तो सजदा भी तू और मन्नत भी तू है।

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दर्द तो बहुत है इस दिल में बताया नहीं कभी,

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 मेरी तो मुस्कान भी तू और सुकून भी तू है।

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सूखे में रख गिले में सोने के किस्से आम हैं,

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 मेरा तो बिछौना भी तू और चादर भी तू है|

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रिश्ते तो बस कहने और निभाने भर के हैं,

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 मेरा दोस्त भी तू और परिवार भी तू है।

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ज्ञान जो तुझसे मिला वह किसी उपन्यास में नहीं,

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 मेरी तो गीता भी तू और उसका सार भी तू है।

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कैसे चलाऊं शब्दों के बाण तुझ पर बोलना भी तुझसे सीखा,

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 मेरे तो शब्द भी तू और उनका अर्थ भी तू है|

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बिखर के अकेले संभल हूं कितनी ही दफा ,

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मेरा तो साहस भी तू और शक्ति भी तू है।

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जिंदगी हसीन झूठ है और मौत कड़वा सच ,

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मेरी हर जन्म की ख्वाहिश भी तू और मुक्ति भी तू है।

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कदम कदम पर धोखे ही मिले हैं सब से,

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 मेरी तो वफा भी तू और विश्वास भी तू है।

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बेशक दिल दुखाया होगा कभी तो तेरा,

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 मेरी तो माफी भी तू और पश्चाताप भी तू है।

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निर्धन होकर भी धनी हूं तुझे पाकर,

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 मेरा तो धन भी तू और खजाना भी तू है।

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क्यों जाऊं किसी तीर्थ पर कभी?

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 मेरी तो यात्रा भी तू और परिक्रमा भी तू है|

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जताना नहीं आता प्यार कितना है तेरे लिए,

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 मेरी तो धड़कनें भी तू और जिंदगी भी तू है।

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जानती हूं बहुत छोटा तोहफा है यह,

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 इस कविता के अल्फाज भी तो और लय भी तू है।

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वत्सला गौड़

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उदयपुर (राज.)


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