आध्यात्मिक गुरु जैनाचार्य लोकेश एवं स्वामी दीपांकर का दो दिवसीय जयपुर प्रवास

पर्यावरण प्रदूषण से वैचारिक प्रदूषण अधिक खतरनाक है  - आचार्य लोकेश
नैतिक मूल्य भारतीय संस्कृति की पहचान – स्वामी दीपांकर


जयपुर। अहिंसा विश्व भारती के संस्थापक जैनाचार्य डॉ. लोकेशजी एवं आध्यात्मिक गुरु स्वामी दीपांकरजी दो दिवसीय प्रवास हेतु जयपुर पहुंचे जहाँ सैकड़ो श्रद्धालुओं ने उनका भावपूर्ण स्वागत किया। दिनभर दर्शनार्थियों को आशीर्वाद हेतु तांता लगा रहा। इस अवसर पर उन्होने शहर के विभिन्न संवाददाताओं को भी संबोधित किया ।

अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त, प्रखर चिंतक, लेखक, शांतिदूत, जैनाचार्य आचार्य डॉ. लोकेश ने संवाददाताओं को संबोधित करते हुए कहा कि अनेकता मे एकता भारतीय संस्कृति की मौलिक विशेषता है। सर्वधर्म सद्भाव उसका मूलमंत्र है। इसी बहुलतावादी संस्कृति के कारण पूरी दुनिया में भारत की विशिष्ट पहचान है  हमे उस महान संस्कृति के संरक्षण व संवर्धन के लिए निरंतर जागरूक रहना है। दुनिया के लिए अन्य देश बाज़ार है किन्तु भारत के लिए एक परिवार है ये वसुदेव कुटुंबकम की भावना हमे विरासत मे मिली है।

आचार्य लोकेश ने कहा कि पर्यावरण प्रदूषण से वैचारिक प्रदूषण अधिक खतरनाक है हम अपने अस्तित्व और विचारो कि तरह दूसरे का अस्तितव और विचारो का सम्मान करना सीखे साथ ही उन्होने कहा कि हम अपने धर्म का ईमानदारी से पालन करे किन्तु दूसरे धर्मों का भी आदर करें । उन्होने कहा कि धर्म हमेशा मनुष्य को सदाचार एवं आत्मा  से जोड़ता है | धर्म वह विचार एवं आचरण है, जो सदैव जोड़ना सिखाता है तोड़ना नहीं एवं मनुष्य के अंदर की पशुता को इंसानियत में  और इंसानियत को देवत्व में बदलने की सामर्थ्य रखता है | अध्यात्म सभी धर्मों का सार है |

उन्होने कहा कि राज्य सत्ता को धर्म व जाति से जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए, धर्म व जाति के आधार पर प्रतिनिधि का चयन एक गलत प्रक्रिया है, हमे अपने क्षेत्र,राज्य एवं देश के प्रतिनिधि का चयन सम्पूर्ण समाज के हित, विकास कार्यों, सामाजिक एवं नैतिक मूल्यों के आधार पर करना चाहिए ।

आध्यात्मिक गुरु स्वामी दीपांकर ने कहा कि भारत भूमि देवताओं की पुण्य भूमि है| हमारे देश की विरासत में हमें नैतिकता एवं सामाजिक मूल्यों का इतिहास मिला है| संपूर्ण विश्व में भारत की पहचान का प्रतीक नैतिकता है | नैतिक मूल्य एक तरह से भारतीय संस्कृति की पहचान पुरखों से विरासत से मिली अनमोल धरोहर है। सत्यवादिता, दयालुता, निष्कपट, सदाचार, संतोष, पारस्परिक सहयोग यह सभी नैतिकता के आधार बिन्दु है | नैतिक मूल्यों के अभाव के कारण व्यक्ति के चरित्र में गिरावट आती जा रही है| आज अपराधों का ग्राफ हर वर्ष बढ़ता जा रहा है | चोरी, डकैती, बलात्कार, हत्याएं इसलिए हो रही है कि व्यक्ति स्वयं के जीवन में कुछ आदर्शों, नैतिक मूल्यों को जीवन में स्थान नही दे पा रहा है | ईमानदारी, सत्यता, विवेक, करुणा, प्रलोभनों से दूर रहना ही नैतिक मूल्यों के आदर्श तत्व है एवं इन्हीं शिक्षाओ पर चलकर हम स्वस्थ समाज का निर्माण कर सकते है।

शिक्षा मनुष्यता की संपूर्णता का  प्रदर्शन है | जो शिक्षा मनुष्य में आत्मनिर्भरता एवं आत्मविश्वास न  जगाए, उस शिक्षा का कोई औचित्य नहीं है। शिक्षा से व्यक्तित्व का निर्माण, जीवन जीने की  दिशा एवं चरित्र निर्माण होना चाहिए |

अध्यात्म युवाओं को चरित्र निर्माण की ओर प्रेरित करता है |  प्रत्येक  मनुष्य जन्म से ही दैवीय गुणों से परिपूर्ण होता है | ये गुण सत्य, निष्ठा, समर्पण, साहस एवं  विश्वास से जाग्रत होते हैं | इनको अपने आचरण में लाने से व्यक्ति महान एवं चरित्रवान बन  सकता है | मनुष्य को महान बनने के लिए संदेह, ईर्ष्या एवं द्वेष छोड़ना होगा | युवाओं में प्रचंड ऊर्जा है, हमें इस युवाशक्ति को उचित दिशा की ओर प्रेरित करना होगा जिससे राष्ट्र का निर्माण सफलतापूर्वक हो सके और भारत प्राचीन गौरव को प्राप्त कर सके |

इस अवसर पर आध्यात्मिक गुरुओं की यात्रा के समन्वयक श्री संजय शर्मा ने सभी का स्वागत करते हुए बताया की संतों के दो दिवसीय जयपुर प्रवास के बाद कल सायं वे दिल्ली प्रस्थान कर जाएंगे । श्री सोहन गिरिजी एवं विनीत शर्मा ने आभार प्रकट किया |


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