मरूभूमि री पहचाण हिरण और खेजड़ी

थार मरुस्थल मांय विचरण करण आळो जीव हिरण अर मरू री शान बणयोड़ी खड़ी राजस्थान रौ राज्य वृक्ष खेजड़ी दोन्यां री अटूट जोड़ी है। समय रै सागै दोनूं अब बहुत कम दिखण लाग्या है! मिनका री नियत अर लाळच सूं ही दोन्यूं रेतीले धौरा सूं अलोप होवण लाग्या है, इणरौ सीधो कारण एक विशेष वर्ग नै ही इणरौ रक्षक समझणो! प्रकृति किणरै सागै कोई भेदभाव कोनी करै तो इणनै बचावण सारू आपां भेदभाव कियां करां अर एक वर्ग विशेष नै ही इणनै बचावण रौ जिम्मेदार क्यूँ समझां.? हिरण स्वतंत्र विचरण करण आळो वन्य जीव है,पण इण टैम बहुत कम देखण मिळ रयौ है! इणरौ कारण शिकारियों द्वारा निडर होय शिकार करणो अर कृषि क्षेत्र मांय किसानों द्वारा बाड़ रूप मे कंटीळी तार अर जाळी काम मे लैवणी जिण मांय उलझ मौत हो ज्यावै! पूराणै टैम मे हर खेत अर हर ठौड़ हिरण देखण मिळता, आपणा बडेरा कामकाज जावता जद हिरण सूं सुगन विचारता अर पछै कोई कामकाज नै रवाना होवता पण आज कहावत इयां है! "सुगन पारखू सैण कठै मुखड़े मीठा वैण कठै रूंख खेजड़ी कैर कठै हिरण हैताळू सैण कठै।। खेजड़ी इणनै मरुस्थल रौ कल्पवृक्ष भी कैवै, आज रै टैम औ औषधीय रूंख कम देखण मिळ रयौ है! जिण ठौड़ पहला 10 पेड़ हा तो आज बिण ठौड़ 3 पेड़ ही देखण सारू मिळै! इणरौ कारण तकनीकी सुविधाओं रो विकास हुवण सूं जड़ों समेत उखाड़ लेवै अर नहर आळी सुविधा होवण सूं इण रूंख रै प्रति लोगां री रुचि कम होयगी! छपनिया काळ मे बडेरा इणरी छाल नै भोजन बणा छपनियौ काळ काढ लियो! आज भी औ कल्पवृक्ष आपरै वजूद खातर रेतीले धौरा मे आपरी ठंडी छाव मे सगळा जीव जंतुओं नै लियोड़ो ऊबौ है! इणरौ मिठो फळ सांगरी घणो गुणकारी है अर स्वाद तो शब्दां सूं लिख्यो कोनी जावै! इणरी कोमल पत्तियां जिणनै लूंग कैवै ,पशुओं रै चारे रूप मे काम आवै दुधारू पशु इणरी पत्तियां सूं ज्यादा दूध देवै! अब मैं सगळा नै इयां ही कहणो चाऊँ ज्यादा सूं ज्यादा खेजड़ी रा वृक्ष लगवावो अर आमणी मरूभौम नै हरी-भरी कियोड़ी राखो। वन्य जीवों अर प्रकृति नै सगळा मिळ-जुळ बचाओ!


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